Ashfaq Ulla Khan Biography in Hindi | अशफाक उल्लाँ खान | Hindi |

अशफाक की लिखी हुई कुछ पंक्ति :-

• उफ़ तक भी जुबां से हम हरगिज न निकालेंगे, तलवार उठाओ तुम, हम सर को झुका देंगे।
• 
सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीका, चलवाओ गन मशीनें, हम सीना अड़ा देंगे।
• 
दिलवाओ हमें फाँसी, ऐलान से कहते हैं, खूं से ही हम शहीदों के, फ़ौज बना देंगे।
• 
मुसाफ़िर जो अंडमान के तूने बनाए ज़ालिम, आज़ाद ही होने पर, हम उनको बुला लेंगे।

• कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएँगे, आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।
• 
हटने के नहीं पीछे, डर कर कभी जुल्मों से, तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे।
• 
बेशस्त्र नहीं है हम, बल है हमें चरखे का, चरखे से जमीं को हम, ता चर्ख गुँजा देंगे।
• 
परवा नहीं कुछ दम की, गम की नहीं, मातम की, है जान हथेली पर, एक दम में गवाँ देंगे।

 


           अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का जन्म उत्तर प्रदेश के शहीदगढ शाहजहाँपुर में रेलवे स्टेशन के पास स्थित कदनखैल जलालनगर मुहल्ले में २२ अक्टूबर १९०० को हुआ था। उनके पिता का नाम मोहम्मद शफीक उल्ला ख़ाँ था। उनकी माँ मजहूरुन्निशाँ बेगम बला की खूबसूरत खबातीनों (स्त्रियों) में गिनी जाती थीं। अशफ़ाक़ ने स्वयं अपनी डायरी में लिखा है कि जहाँ एक ओर उनके बाप-दादों के खानदान में एक भी ग्रेजुएट होने तक की तालीम न पा सका वहीं दूसरी ओर उनकी ननिहाल में सभी लोग उच्च शिक्षित थे। उनमें से कई तो डिप्टी कलेक्टर व एस. जे. एम. (सब जुडीशियल मैजिस्ट्रेट) के ओहदों पर मुलाजिम भी रह चुके थे। १८५७ के गदर में उन लोगों (उनके ननिहाल वालों) ने जब हिन्दुस्तान का साथ नहीं दिया तो जनता ने गुस्से में आकर उनकी आलीशान कोठी को आग के हवाले कर दिया था। वह कोठी आज भी पूरे शहर में जली कोठी के नाम से मशहूर है। बहरहाल अशफ़ाक़ ने अपनी कुरबानी देकर ननिहाल वालों के नाम पर लगे उस बदनुमा दाग को हमेशा - हमेशा के लिये धो डाला।

                 बचपन से इन्हें खेलने, तैरने, घुड़सवारी और बन्दुक चलने में बहुत मजा आता था| इनका कद काठी मजबूत और बहुत सुन्दर था| बचपन से ही इनके मन देश के प्रति अनुराग था| देश की भलाई के लिये चल रहे आंदोलनों की कक्षा में वे बहुत रूचि से पढाई करते थे| धीरे धीरे उनमें क्रांतिकारी के भाव पैदा हुए| वे हर समय इस प्रयास में रहते थे कि किसी ऐसे व्यक्ति से भेंट हो जाय जो क्रांतिकारी दल का सदस्य हो| जब मैनपुरी केस के दौरान उन्हें यह पता चला कि राम प्रसाद बिस्मिल उन्हीं के शहर के हैं तो वे उनसे मिलने की कोशिश करने लगे|

     अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ के बड़े भाई रियासत उल्ला ख़ाँ रामप्रसाद बिस्मिल के सहकर्मी थे| वे अक्सर अशफाक को उनकी बहादुरी के किस्से सुनाया करते थे| उन्होंने बताया कि वे एक कवि भी हैं| जब वर्ष 1920 में मैनपुरी कांड के बाद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ को पता लगा कि रामप्रसाद बिस्मिल उन्ही के शहर में है तो उन्होंने बिस्मिल जी से कई बार उनसे मुलाकात की| परन्तु बिस्मिल से उनकी कोई यादगार अनुभूति नहीं बन पाई|

    


     वर्ष 1922 में असहयोग आन्दोलन के दौरान रामप्रसादबिस्मिल ने शाहजहाँपुर में एक बैठक का आयोजन किया| उस बैठक के दौरान बिस्मिल ने एक कविता पढ़ी थी | जिस पर अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने आमीन कहकर उस कविता की तारीफ की| बाद में रामप्रसाद बिस्मिल ने उन्हें बुलाकर परिचय पुछा| जिसके बाद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने बताया की वह रियासत ख़ाँ जी का छोटा सगा भाई और उर्दू शायर भी हैं| कुछ समय बाद वे दोनों बहुत ही अच्छे दोस्त बन गए| जिसके बाद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने रामप्रसादबिस्मिल के संघठन मातृवेदी” के सक्रीय सदस्य के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया| इस तरह से वे क्रांतिकारी जीवन में आ गए| वे हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे| आर्य समाज के एक सक्रिय सदस्य और समर्पित हिंदू राम प्रसाद बिस्मिल अन्य धर्मों के लोगों को भी बराबर सम्मान देते थे। वहीं दूसरी ओर एक कट्टर मुसलमान परिवार से संबंधित अशफ़ाक उल्ला खान भी ऐसे ही स्वभाव वाले थे। धर्मों में भिन्नता होने के बावजूद दोनों का मकसद सिर्फ देश को स्वराज दिलवाना ही था। यही कारण है कि जल्द ही अशफ़ाक, राम प्रसाद बिस्मिल के विश्वासपात्र बन गए। धीरे-धीरे इनकी दोस्ती भी गहरी होती गई। इन दोनों क्रांतिकारियों की दोस्ती आज भी हिन्दू मुस्लिम- एकता की एक बेहतरीन मिसाल है।

           जब क्रांतिकारियों को यह लगने लगा कि अंग्रेजों से विनम्रता से बात करना या किसी भी प्रकार का आग्रह करना फिजूल है तो उन्होंने विस्फोटकों और गोलीबारी का प्रयोग करने की योजना बनाई| इस समय जो क्रांतिकारी विचारधारा विकसित हुई वह पुराने स्वतंत्रता सेनानियों और गांधी जी की विचारधारा से बिलकुल उलट थी| लेकिन इन सब सामग्रियों के लिए अधिकाधिक धन की आवश्यकता थी|

                           इसीलिए राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार के धन को लूटने का निश्चय किया| उन्होंने सहारनपुर-लखनऊ 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन में जाने वाले धन को लूटने की योजना बनाई| 9 अगस्त, 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफ़ाक उल्ला खां समेत आठ अन्य क्रांतिकारियों ने इस ट्रेन को लूटा. जिनमे रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिडी, ठाकुर रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल मुकुंद और मन्मथ नाथ गुप्त शामिल थे |


    ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों के इस बहादुरी भरे कदम से भौंचक्की रह गई थी| इसलिए इस बात को बहुत ही सीरियसली लेते हुए सरकार ने कुख्यात स्कॉटलैंड यार्ड को इसकी तफ्तीश में लगा दिया| एक महीने तक CID ने भी पूरी मेहनत से एक-एक सुबूत जुटाए और बहुत सारे क्रांतिकारियों को एक ही रात में गिरफ्तार करने में कामयाब रही| 26 सितंबर 1925 को पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को भी गिरफ्तार कर लिया गया और सारे लोग भी शाहजहांपुर में ही पकड़े गए|

        पर अशफाक बनारस भाग निकले| जहां से वो बिहार चले गए. वहां वो एक इंजीनियरिंग कंपनी में दस महीनों तक काम करते रहे| वो गदर क्रांति के लाला हरदयाल से मिलने विदेश भी जाना चाहते थे| अपने क्रांतिकारी संघर्ष के लिए अशफाक उनकी मदद चाहते थे| इसके लिए वो दिल्ली गए जहां से उनका विदेश जाने का प्लान था| पर उनके एक अफगान दोस्त ने, जिस पर अशफाक को बहुत भरोसा था, उन्हें धोखा दे दिया और अशफाक को गिरफ्तार कर लिया गया|19 दिसंबर, 1927 को एक ही दिन एक ही समय लेकिन अलग-अलग जेलों (फैजाबाद और गोरखपुर) में दो दोस्तों, राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां, को फांसी दे दी गई|




Reactions

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ