असहयोग आंदोलन दिसंबर 1920 में नागपुर अधिवेशन से शुरू हुआ|इस आंदोलन में ब्रिटिश शासन के निचे शासन की जगह पूर्ण स्वराज की मांग उठी|इस आंदोलन में हिन्दू-मुस्लिम एकता, स्वदेशी चीजों का आग्रह, हर घरो में चरखे देना, ‘तिलक स्वराज्य फंड’ में 1 करोड़ रुपये इकठ्ठा करना, राष्ट्रिय शिक्षण, अस्पृश्यता निवारण जेसे सकारात्मक पासे थे जबकि दूसरी और सरकारी नौकरियो का त्याग, धारासभाओ का त्याग, सरकारी स्कुल और कोलेज का त्याग जेसे पासे थे|
आंदोलन
की शुरुआत में महात्मा गांधी ने और रविंद्र नाथ टैगोर ने अपनी स्थानिक स्वराज्य
संस्था का त्याग किया । गांधीजी की स्थानिक संस्था का नाम'
केसर ए हिंद' और रविंद्र नाथ टैगोर की स्थानिक संस्था का नाम '
नाइटहुड सम्मान'
था । विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूल और कॉलेज
का त्याग किया । देश के अलग-अलग इलाकों में विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई । ड्यूक
ऑफ़ कैनाट भारत आए उनका भी विरोध किया गया( सन 1921) । प्रिंस ऑफ वेल्स के सम्मान का भी विरोध किया गया । ऐसे
कदम उठाने से देश में राष्ट्रभक्ति की ज्योत जली । दूसरी ओर देश में राष्ट्रीय
स्कूल और कॉलेज की स्थापना हुई । जिसमें काशी, बिहार,
गुजरात इत्यादि नाम की विद्यापीठ की स्थापना
हुई ।
देश में हो रहे स्वदेशी प्रचार से इंग्लैंड
से आयात होते जूते, कपड़े, सिगरेट
इत्यादि चीजें बंद हो गई । इंग्लैंड को व्यापार में हुए नुकसान से ब्रिटिश
पार्लियामेंट चौक उठी । इस आंदोलन को निष्फल बनाने के लिए सरकार ने दमन नीति का
सहारा लिया । अंधाधुंध गोलीबारी, लाठीचार्ज
और सामूहिक धरपकड़ होने लगी लेकिन भारत की प्रजा अपनी हिम्मत नहीं हारी ऊपर से
उनके मनसे लाठी और जेल का डर निकल गया ।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में चौरीचौरा गांव
में 5 फरवरी 1922 में निकली रैली के दरमियां वहां की पुलिस में गोलीबारी शुरू
कर दी । इस बात से गुस्सा होकर वहां के लोगों ने उनकी पुलिस चौकी में आग लगा दी
जिससे कि 21 पुलिस अफसर की मौत हो गई ।
इस बात की खबर जब गांधी जी तक पहुंची तो उन्होंने कहा की '
अहिंसा का मूल्य ना समझने वाले लोगों के हाथ
में सत्याग्रह जैसा हथियार देकर मैंने हिमालय कितनी बड़ी गलती की है'
। इसके बाद उन्होंने असहयोग आंदोलन को बंद कर
दिया ।
इस आंदोलन से भारत वासियों को मनचाही सफलता
नहीं मिली लेकिन इसके बहुत से सकारात्मक परिणाम निकले । आंदोलन के बाद लोगों को
अपने हक के लिए लड़ाई का महत्व समझ आया । लोगों में अन्याय विरोध लड़ने की भावना
और प्रबल हुई । पहले आंदोलन और देश भक्ति सिर्फ पढ़े लिखे लोगों तक ही सीमित थी
लेकिन इस आंदोलन के बाद यह लड़ाई हर गांव तक पहुंच गई । लोगों में से अंग्रेज
सरकार का डर निकल गया और हिंदू मुस्लिम एक साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई का
हिस्सा बने ।
लोगों में पैदा हुई राष्ट्रीय जागृति को
टिकाए रखने के लिए चितरंजन दास मुंशी और मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पक्ष की रचना की
जिनका उद्देश्य धारा सभा में प्रवेश करके सरकार की अयोग्य नीति का विरोध करना था ।
स्वराज पक्ष ने गांधी जी के बताएं उद्देश्यों पर चलने का निर्णय किया । नवंबर 1923
में हुए मतदान में स्वराज पक्ष एक बहुत बड़े
मजबूत पक्ष के तौर पर बाहर आया ।
स्वराज पक्ष ने धारा सभा में प्रजा के
प्रश्नों को केंद्र में रखकर कई सारे अंदाज़ पत्र बाहर निकाले । स्वराज पक्ष ने
पूरे शिस्त से अपनी कामगिरि निभाई । भारत के लोगों मैं देश चलाने की क्षमता है यह
बात अंग्रेज सरकार को साबित करके दिखाइ ।
जून 1925 में चितरंजन दास की मृत्यु होने के बाद स्वराज्य पक्ष कमजोर
पड़ा । कुछ सभ्य सरकार को सहयोग देते तो पक्ष के कुछ सभ्य दूसरा अपना पक्ष बनाते ।
उसके बाद 1926 के मतदान में मद्रास के
अलावा सभी प्रांतों में स्वराज्य पक्ष के उम्मीदवारों की हार हुई ।
images by:-Gandhi Heritage Portal, CC BY-SA 3.0 <https://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0>, via Wikimedia Commons
:-Bundesarchiv, Bild 102-11643 / CC-BY-SA 3.0, CC BY-SA 3.0 DE <https://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0/de/deed.en>, via Wikimedia Commons





0 टिप्पणियाँ