जन्म :-25 दिसम्बर 1904 बनारस
मृत्यु :-23 नवम्बर 1984 सुल्तानपुर, उत्तर
प्रदेश
राष्ट्र :- भारत
व्यवसाय :- स्वतंत्र सेनानी
प्रसिद्धि :- काकोरी कांड
शचीन्द्रनाथ बख्शी का जन्म 25 दिसम्बर 1904 को बनारस में हुआ था। उनके पिता मूलत: बंगाल के फरीदपुर जिले के रहने वाले थे जो
बाद में बंगाल से आकर संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध के शहर बनारस में बस गये थे।
सचीन दा ने एफ॰ए॰ (इण्टरमीडिएट) की पढ़ाई छोड़कर कुछ क्रान्तिकारी कार्य करने की
सोची। इस उद्देश्य से उन्होंने पहले सेण्ट्र्ल हेल्थ
इम्प्रूविंग सोसाइटी बनायी फिर सेण्ट्रल
हेल्थ यूनियन का गठन किया। हेल्थ यूनियन के बैनर तले
उन्होंने बनारस के नवयुवकों को संगठित किया और तैराकी की कई प्रतियोगिताएँ आयोजित
कीं। 1923 में दिल्ली की स्पेशल काँग्रेस के दौरान वे राम प्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क में
आये। उसके बाद वे उनकी क्रान्तिकारी पार्टी H.R.A में शामिल हो गये। कुछ दिनों झाँसी से निकलने वाले एक अखबार का सम्पादन किया।
हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ की ओर से प्रकाशित विज्ञापन और
उसके संविधान को लेकर बंगाल पहुँचे दल के
दोनों नेता- शचीन्द्रनाथ सान्याल बाँकुरा में उस समय गिरफ्तार कर लिये गये जब वे
यह विज्ञापन अपने किसी साथी को पोस्ट करने जा रहे थे। इसी प्रकार योगेशचन्द्रचटर्जी कानपुर से पार्टी की
मीटिंग करके जैसे ही हावड़ा स्टेशन पर ट्रेन
से उतरे कि एच०आर०ए० के संविधान की ढेर सारी प्रतियों के साथ पकड़ लिये गये और
उन्हें हजारीबाग जेल में बन्द कर
दिया गया।
दोनों प्रमुख
नेताओं के गिरफ्तार हो जाने से राम प्रसादबिस्मिल के कन्धों पर उत्तरप्रदेश के साथ-साथ बंगाल
के क्रान्तिकारी सदस्यों का उत्तरदायित्व भी आ गया। बिस्मिल का स्वभाव था कि वे या
तो किसी काम को हाथ में लेते न थे और यदि एक बार काम हाथ में ले लिया तो उसे पूरा
किये बगैर छोड़ते न थे। पार्टी के कार्य हेतु धन की आवश्यकता पहले भी थी किन्तु अब
तो वह आवश्यकता और भी अधिक बढ गयी थी। कहीं से भी धन प्राप्त होता न देख उन्होंने
७ मार्च १९२५ को बिचपुरी तथा २४ मई १९२५
को द्वारकापुर में दो राजनीतिक डकैतियाँ डालीं तो परन्तु उनमें कुछ विशेष धन
उन्हें प्राप्त न हो सका।
इन दोनों
डकैतियों में एक-एक व्यक्ति मौके पर ही मारा गया। इससे बिस्मिल की आत्मा को
अत्यधिक कष्ट हुआ। आखिरकार उन्होंने यह पक्का निश्चय कर लिया कि वे अब केवल सरकारी
खजाना ही लूटेंगे, हिन्दुस्तान के किसी भी रईस के घर डकैती बिल्कुल न डालेंगे।
८ अगस्त को राम प्रसाद बिस्मिल के घर पर हुई एक
इमर्जेन्सी मीटिंग में निर्णय लेकर योजना बनी और अगले ही दिन ९ अगस्त १९२५ को
हरदोई शहर के रेलवे स्टेशन से
बिस्मिल के नेतृत्व में कुल १० लोग, जिनमें
शाहजहाँपुर से बिस्मिल के अतिरिक्त अशफाक उल्ला खाँ, मुरारी शर्मा तथा बनवारी लाल, बंगाल से राजेन्द्र लाहिडी, शचीन्द्रनाथ
बख्शी तथा केशव चक्रवर्ती (छद्मनाम), बनारस से चन्द्रशेखर आजाद तथा मन्मथनाथ गुप्त
एवं औरैया से अकेले
मुकुन्दी लाल शामिल थे; ८ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुए।
इन क्रान्तिकारियों के पास पिस्तौलों के अतिरिक्त जर्मनी के बने चार माउजर भी थे जिनके बट में
कुन्दा लगा लेने से वह छोटी स्वचालित रायफल की तरह लगता था और सामने वाले के मन
में भय पैदा कर देता था। इन माउजरों की मारक क्षमता भी अधिक होती थी उन दिनों ये
माउजर आज की ए०के०-४७ रायफल की तरह चर्चित हुआ करते थे। लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुक कर
जैसे ही गाड़ी आगे बढी, क्रान्तिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और रक्षक के
डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। पहले तो उसे खोलने की प्रयास
किया गया किन्तु जब वह नहीं खुला तो अशफाक उल्ला खाँ ने अपना माउजर मन्मथनाथ गुप्त
को पकड़ा दिया और हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने में जुट गए।
मन्मथनाथ गुप्ता ने
उत्सुकतावश यात्री का ट्रैगर दबा दिया जिससे छूटी गोली
अहमद अली नाम के यात्री को लग गयी। वह मौके पर ही ढेर हो गया। शीघ्रतावश चाँदी के
सिक्कों व नोटों से भरे चमड़े के थैले चादरों में बाँधकर वहाँ से भागने में एक
चादर वहीं छूट गई। अगले दिन समाचार पत्रों के माध्यम से यह समाचार पूरे संसार में
फैल गया। ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गम्भीरता से लिया।
बख्शी ने काकोरी काण्ड में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया था
परन्तु पुलिस के हाथ नहीं आये। घर से फरार हो गये और बिहार में पार्टी का कार्य छुपे तौर पर करते
रहे। उनको भागलपुर में पुलिस
उस समय गिरफ्तार कर पायी जब काकोरी-काण्ड के मुख्य मुकदमे का फैसला हो चुका था।
उन्हें और अशफाक उल्ला खां को सजा दिलाने के लिये लखनऊ की विशेष अदालत में काकोरी
षड्यन्त्र का पूरक मुकदमा दर्ज़ हुआ। 13 जुलाई 1927 को उन्हें
आजीवन कारावास की सजा दी गयी। इसी मुकदमें में अशफाक उल्ला खां को फाँसी की सजा
हुई थी।
1937 में जेल से छूटकर आये तो काँग्रेस पार्टी में शामिल
हो गये और पूरी निष्ठा से काम किया। स्वराज्य प्राप्ति के पश्चात् गरीबी में भी
हँसते हुए गुजारा किया किसी से कोई शिकायत न की। परन्तु काँग्रेस की आपाधापी और
आदर्श-भ्रष्टता से ऊबकर उन्होंने पार्टी छोड़ दी और जनसंघ में चले गये। जनसंघ के
टिकट पर उन्होंने चुनाव लड़ा और उतरप्रदेश
विधानसभा के सदस्य चुने गये।
स्वतन्त्र भारत में काँग्रेस से उनका
मोहभंग हुआ और वे जनसंघ में शामिल हो गये। उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीता और लखनऊ जाकर रहने लगे। अपने जीवन काल में उन्होंने दो पुस्तकें भी लिखीं। सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) में 80 वर्ष का आयु में 23 नवम्बर 1984 को उनका निधन हुआ।



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