भारत में क्रन्तिकारी प्रवृतिया| Fiery revolutionary trend in India| Britisher in India-part-7

 


           हिंदी में एक मशहूर कहावत है' लातों के भूत बातों से नहीं मानते' और यही चीज अंग्रेजों के साथ भी थी । अंग्रेज शासन के विरुद्ध कॉन्ग्रेस जोकि उस वक्त आजादी के प्रयास कर रही थी अंग्रेजों से केवल विनती करती और मात्र ठराव पसार करती । जिससे कि कई लोगों में काफी नाराजगी थी क्योंकि हम अंग्रेजो के खिलाफ शस्त्र नहीं उठा रहे थे सिर्फ उनसे न्याय की मांग कर रहे थे । इस बात से कई लोग कांग्रेस को छोड़कर क्रांतिकारी प्रवृत्तियों में जुड़ गए ।

    



         भारत में क्रांतिकारी प्रवृत्तियों की शुरुआत 'वासुदेव बलवंत फड़के' ने की थी । दामोदर चाफेकर तथा बाल कृष्णा चाफेकर भाई, वीर सावरकर, बारिन्द्रनाथ घोष, खुदीराम बोज, प्रफुल्ल चाकी, रामप्रसाद उर्फ बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर उर्फ आजाद, भगत सिंह, शिवराम राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, रोशन सीह जैसे अनेक क्रांतिवीरो ने राष्ट्रवाद की ज्योत जलाई रखी ।

      



     सन 1907 मैं कांग्रेस अधिवेशन के दो हिस्से हो गए । कांग्रेस दो जूथो में बट गया जिसमें एक 'जहाल' और दूसरा 'मवाल' जुथ था । मवाल जुथ में शांतिप्रिय नेता थे जबकि जहाल जुथ में उग्र क्रांतिकारी स्वभाव के नेता थे । क्रांतिकारी प्रवृत्तियों ने अंग्रेज सरकार की नींद उड़ा कर रख दी थी ।

   






   

  उग्र क्रांतिकारी प्रवृत्तियों में अंग्रेजों की मालगाड़ी लूटना, उनके जहाज तबाह करना, अंग्रेज गवर्नर की हत्या करना, उनके हथियार लूटना, बम बनाने और अंग्रेज चौकिया गिराने जैसी घटनाएं शामिल थी । जिसमें 6 अगस्त 1925 मैं हुई काकोरी ट्रेन लूट बहुत चर्चा में आई थी । इस कांड में क्रांतिकारियों ने काकोरी से आने वाली ट्रेन से अंग्रेजों का खजाना चुराया था जोकि अंग्रेजों ने भारतीयों से ही लूटा था ।

   



    लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल की त्रिपुटी को लाल-बाल-पाल की त्रिपुटी कहा जाता है । जिसमें बाल गंगाधर तिलक ने ऐलान किया था की'' स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही मानूंगा'' । यह शब्द क्रांतिकारियों के लिए एक नारा बन गए थे ।

      उस वक्त भारत के नौजवानों में एक अलग सी ताकत थी । भारत के युवाओं ने अंग्रेज शासन से आजादी के प्रयास अपने हाथों में लिए थे । भारत के नौजवान उस वक्त अपनी जान दे भी सकते थे और अंग्रेजों की जान ले भी सकते थे । क्रांतिकारी प्रवृत्तियों में बहुत से क्रांतिकारियों ने शहीदी को गले लगाया था ।

    



   भारत में महाराष्ट्र, बंगाल, पंजाब, बिहार, गुजरात, राजस्थान, मद्रास, कर्नाटक जैसे सभी राज्यों में उग्र क्रांतिकारी प्रवृत्तियां फैल गई थी । इन प्रवृत्तियों में अभिनव भारत समाज, अनुशीलन समिति, मित्र मेला सोसाइटी, अंजुमन-ए- मुह्हिल्ला ने वतन, भारत माता जैसी संस्थाएं बनाकर क्रांतिकारी प्रवृत्तियों को बिग दिया ।

    


      गुजरात में अरविंद घोष ने भवानी मंदिर, कसरत, गुलाब की कहानी जैसे नाम वाली किताबें प्रकाशित की । इन किताबों में क्रांति की योजनाएं और हथियार बनाने की सामग्री और रीत का वर्णन किया गया था लेकिन ऐसे शीर्षक होने के कारण अंग्रेजों को इन पर शक नहीं होता है ।

        दोस्तों सिर्फ एक आर्टिकल में सारी क्रांतिकारी प्रवृत्तियों का वर्णन नहीं किया जा सकता इसलिए सभी क्रांतिकारी प्रवृत्तियों को हम अगले आर्टिकल्स में जानेंगे । आपका कीमती समय देने के लिए धन्यवाद ।

 

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