- प्रारंभिक जीवन
व्यक्ति
का नाम था- वासुदेव बलवंत फड़के- पुणे में सैन्य वित्त विभाग का कर्मचारी। ठाणे
जनपद के शिर्दों में 4 नवम्बर, 1845 को जन्मने वाले वासुदेव का परिवार
कोंकण के एक गांव केल्शी का था। सन् 1862 में वह बंबई
विश्वविद्यालय के शुरुआती स्नातकों में थे। वर्ष 1865 में पुणे आने से
पहले उन्होंने ग्रांट मेडिकल कॉलेज एवं मुंबई के सेना रसद विभाग कार्यालय जैसी कई
सरकारी संस्थाओं में कार्य किया था। वह एक पारिवारिक व्यक्ति थे। यह लगभग असंभव था
कि उनके जैसा व्यक्ति सरकार के प्रति अलगाव को प्रचारित करे। किंतु वह दिन दहाड़े ऐसा
कर रहे थे। उन दिनों वह स्पष्टतः एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जो अंग्रेज़ों को बाहर का
रास्ता दिखाने की बात कर रहे थे। पश्चिम भारत में बॉम्बे प्रेसिडेंसी एसोसिएशन एवं
पूना सार्वजनिक सभा आदि से प्रगट होता नया-नया सार्वजनिक जीवन केवल संवैधानिक
राजनीति तक ही सीमित था।
विद्यार्थी जीवन में ही वासुदेव बलवन्त
फड़के 1857 ई. की विफल क्रान्ति के
समाचारों से परिचित हो चुके थे। शिक्षा पूरी करके फड़के ने 'ग्रेट इंडियन पेनिंसुला रेलवे' और 'मिलिट्री फ़ाइनेंस
डिपार्टमेंट', पूना में नौकरी की।
उन्होंने जंगल में एक व्यायामशाला बनाई, जहाँ ज्योतिबा फुले भी उनके
साथी थे। यहाँ लोगों को शस्त्र चलाने का भी अभ्यास कराया
जाता था। लोकमान्य तिलक ने भी वहाँ शस्त्र चलाना सीखा था।
- व्यक्तिगत जीवन
वासुदेव फड़के ने 28 साल की उम्र में अपनी पहली शादी की थी, लेकिन पहली पत्नी की मृत्यु के बाद फिर उन्होंने दूसरा विवाह किया था।वासुदेव फड़के ने ‘ग्रेट इंडियन पेनिंसुला रेलवे’ और ‘मिलिट्री फ़ाइनेंस डिपार्टमेंट’, में ब्रिटिश सरकार के अधीन नौकरी की थी। वहीं जिस दौरान वासुदेव बलवंत फड़के अपनी नौकरी कर रहे थे, तभी उनकी मां की मौत हो गई।
1871 ई. में एक दिन सायंकाल वासुदेव बलवन्त फड़के कुछ गंभीर विचार में बैठे थे। तभी उनकी माताजी की तीव्र अस्वस्थता का तार उनको मिला। इसमें लिखा था कि 'वासु' (वासुदेव बलवन्त फड़के) तुम शीघ्र ही घर आ जाओ, नहीं तो माँ के दर्शन भी शायद न हो सकेंगे। इस वेदनापूर्ण तार को पढ़कर अतीत की स्मृतियाँ फ़ड़के के मानस पटल पर आ गयीं और तार लेकर वे अंग्रेज अधिकारी के पास अवकाश का प्रार्थना-पत्र देने के लिए गए। किन्तु अंग्रेज़ तो भारतीयों को अपमानित करने के लिए सतत प्रयासरत रहते थे। उस अंग्रेज़ अधिकारी ने अवकाश नहीं दिया, लेकिन वासुदेव बलवन्त फड़के दूसरे दिन अपने गांव चले आए। गांव आने पर वासुदेव पर वज्राघात हुआ। जब उन्होंने देखा कि उनका मुंह देखे बिना ही तड़पते हुए उनकी ममतामयी माँ चल बसी हैं। उन्होंने पांव छूकर रोते हुए माता से क्षमा मांगी, किन्तु अंग्रेज़ी शासन के दुव्यर्वहार से उनका हृदय द्रवित हो उठा।
- रानाडे से हुए प्रभावित
1857 की क्रान्ति के दमन के बाद देश में धीरे-धीरे नई जागृति आई और विभिन्न क्षेत्रों में संगठन बनने लगे। इन्हीं में एक संस्था पूना की 'सार्वजनिक सभा' थी। इस सभा के तत्वावधान में हुई एक मीटिंग में 1870 ई. में महादेव गोविन्द रानाडे ने एक भाषण दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अंग्रेज़ किस प्रकार भारत की आर्थिक लूट कर रहे हैं। इसका फड़के पर बड़ा प्रभाव पड़ा। वे नौकरी करते हुए भी छुट्टी के दिनों में गांव-गांव घूमकर लोगों में इस लूट के विरोध में प्रचार करते रहे.
- क्रांतिकारी जीवन
इस समय तक
फड़के ने स्वयं को एक पथ-प्रदर्शक साबित कर दिया था। उन्होंने तिलक, लालालाजपतराय एवं बिपिन चंद्र पाल से काफी पहले देशभक्ति की एक सार्वजनिक संस्कृति
विकसित कर ली थी। तत्पश्चात 1876-77 में महाराष्ट्र
भारी दुर्भिक्ष का शिकार हुआ। फड़के ने अपनी आंखों से विनाश का मंज़र देखने के
लिये गुप्त रूप से प्रभावित जनपदों की यात्राएं की। उन्होंने लोगों की कठिनाइयों
के लिये ग़लत ब्रिटिश नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया, और क्रांति का
रास्ता अपनाने का निर्णय भी लिया।
यहां भी वह पथ-प्रदर्शक साबित हुए । भारतीय
क्रांति के जनक 20 फरवरी 1879 को फड़के ने
अपने साथियों विष्णु गदरे, गोपाल साठे, गणेश देवधर एवं
गोपाल हरी कर्वे के साथ पुणे से आठ मील उत्तर लोनी के बाहर 200 मज़बूत
योद्धाओं वाली फौज की घोषणा कर दी। यह संभवतः भारत की पहली क्रांतिकारी सेना थी।
फड़के ने स्वीकार किया कि अपने विद्रोह को जारी रखने के लिये डकैती को एक आवश्यक
बुराई के तौर पर अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि संघर्ष में शामिल होने के लिये अपने
घरों को छोड़ने का उनका समय आ गया है। इस अवसर पर उन्होंने कहा, "हम अपने
पहले हमले से और अधिक हथियार एवं ज़्यादा धन एकत्रित करेंगे। हम पुलिस एवं सरकार
के विरुद्ध संघर्ष करेंगे।"
इस दौरान उन्होंने लगातार बहुत ख़तरा उठाया। धन एवं हथियार
एकत्रित करने के लिये फड़के के दल ने मुंबई और बाद में कोंकण क्षेत्र के निकट लूट
की कुछ ख़तरनाक कार्रवाइयों को अंजाम दिया। इससे अंग्रेज़ थर्रा उठे। पूरे क्षेत्र
में फड़के के नाम की धाक फैल गई। मई 1879 में फड़के ने
चेतावनी देते हुए सरकार की शोषण करने वाली आर्थिक नीतियों की सुप्रसिद्ध भर्त्सना
की। उनकी इस घोषणा की प्रतियां गवर्नर, ज़िलाधीश एवं
अन्य सरकारी अधिकारियों को भेजी गईं। इससे संपूर्ण भारत में सनसनी फैल गई। उनके
विद्रोह ने बंकिम चंद्र चटोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ (1882) के कथानक
को तर्क-साध्य और अप्रत्य़क्ष तौर पर प्रभावित किया।
फड़के पर 3 जून 1879 को लंदन से
प्रकाशित होने वाले 'द टाइम्स' ने एक लंबा सम्पादकीय प्रकाशित किया।
इसने कृषि-क्षेत्र में फैलती बेचैनी के समाधान के लिये सरकार को अपनी भू-निर्धारण
नीतियां संशोधित करने की सलाह दी। अंग्रेज़, हालांकि अपनी
पकड़ मज़बूत बना रहे थे। फड़के का अल्पकालिक कैरियर लगभग पूरा हो चुका था। वह
आंध्रप्रदेश के कुरनूल जनपद में स्थित ज्योतिर्लिंग श्री शैल मल्लिकार्जुन महादेव
मंदिर जाने के लिये महाराष्ट्र से भाग गए। 25 अप्रेल 1879 को समाप्त
अपनी आत्मकथा के दूसरे भाग में उन्होंने अपनी असफलता के लिये समस्त भारतीयों से
क्षमा याचना की। फड़के इस पवित्र स्थान में, जहां उनके आदर्श
छत्रपति शिवाजी महाराज भी एक बार आए थे, अपने जीवन का बलिदान
करना चाहते थे लेकिन पुजारी ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।
- गिरफ़्तारी और शहीदी
उन्होंने रोहिल्ला, सिक्खों और निज़ाम की सेना में कार्यरत अरबों के साथ मिलकर एक नई क्रांति का पुनर्गठन करने की कोशिश की। उन्होंने भारत के विभिन्न भागों में अपने संदेशवाहक भेजे। किंतु भाग्य को उनकी योजनाओं की सफलता स्वीकार नहीं थी। देवार नवदगी नामक गांव में 20 जुलाई 1879 को उनकी गिरफ़्तारी के साथ यह समाप्त हुआ।1879 ई. में वासुदेव बलवंत फड़के जी को क्रूर ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और अजीवन कारावास यानि की आजीवन कालापानी की सजा सुनाई दी गई।इस दौरान जेल में उन्होंने तमाम शारीरिक यातानाएं दी गईं, जिसके चलते जेल के अंदर ही उन्होंने 17 फरवरी, साल 1883 में अपनी आंखिरी सांस ली।



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