Parshuram History in Hindi | भगवान परशुराम के बारे में सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में |



 भारत में हिन्दू धर्म को मानने वाले अधिक लोग हैं| मध्य कालीन समय के बाद जब से हिन्दू धर्म का पुनुरोद्धार हुआ है, तब से परशुराम जयंती का महत्व और अधिक बढ़ गया है| इस दिन उपवास के साथ साथ सर्व ब्राह्मण का जुलूस, सत्संग भी सम्पन्न किए जाते हैं|

परशुराम ऋषि जमादग्नि तथा रेणुका के पांचवें पुत्र थे| ऋषि जमादग्नि सप्तऋषि में से एक ऋषि थे|
भगवान विष्णु के 6वें अवतार के रूप में परशुराम पृथ्वी पर अवतरित हुए| परशुराम वीरता के साक्षात उदाहरण थे|हिन्दू धर्म में परशुराम के बारे में यह मान्यता है, कि वे त्रेता युग एवं द्वापर युग से अमर हैं|परशुराम की त्रेता युग दौरान रामायण में तथा द्वापर युग के दौरान महाभारत में अहम भूमिका है| रामायण में सीता के स्वयंवर में भगवान राम द्वारा शिवजी का पिनाक धनुष तोड़ने पर परशुराम सबसे अधिक क्रोधित हुए थे|
     

     परशुराम वीरता के साक्षात उदाहरण थे| वे अपने माता–पिता के प्रति पूरी तरह से समर्पित थे| एक बार परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि अपनी पत्नी रेणुका पर क्रोधित हुए| रेणुका एक बार मिट्टी के घड़े को लेकर पानी भरने नदी किनारे गयी, किन्तु नदी किनारे कुछ देवताओं के आने से उन्हें आश्रम लौटने में देरी हो गयी| ऋषि जमदग्नि ने अपनी शक्ति से रेणुका के देर से आने का कारण जान लिया और वे उन पर अधिक क्रोधित हुए| उन्होने क्रोध में आ कर अपने सभी पुत्रों को बुला कर अपनी माता का वध करने की आज्ञा दी| किन्तु ऋषि के चारों पुत्र वासु, विस्वा वासु, बृहुध्यणु, ब्रूत्वकन्व ने अपनी माता के प्रति प्रेम भाव व्यक्त करते हुए, अपने पिता की आज्ञा को मानने से इंकार कर दिया| इससे ऋषि जमदग्नि ने क्रोधवश अपने सभी पुत्रों को पत्थर बनने का श्राप दे दिया| इसके बाद ऋषि जमदग्नि ने परशुराम को अपनी माता का वध करने की आज्ञा दी| 

परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपना अस्त्र फरसा उठाया, और उनके चरणों में सिर नवाकर तुरंत ही अपनी माता रेणुका का वध कर दिया| इस पर जमदग्नि अपने पुत्र से संतुष्ट हुए एवं उन्होने परशुराम से मनचाहा वरदान मांगने को कहा| परशुराम ने बड़ी ही चतुराई एवं विवेक से अपनी माता रेणुका तथा अपने भाइयों के प्रेमवश हो कर सभी को पुनः जीवित करने का वरदान मांग लिया| उनके पिता ने उनके वरदान को पूर्ण करते हुए पत्नी रेणुका तथा चारों पुत्रों को फिर से नवजीवन प्रदान किया| ऋषि जमदग्नि अपने पुत्र परशुराम से बहुत प्रसन्न हुए|

हैहयवंश में कार्तवीर्य अर्जुन बड़ा ही प्रतापी राजा था ।उसने अपने गुरु दत्तात्रेय को प्रसन्न करके वरदान के रूप में उनसे हजार भुजायें प्राप्त की । हजार भुजाओं के कारण ही उसे सहस्त्रबाहु के नाम से भी जाना जाता है । उसे अपने वैभव और शक्ति का बहुत घमंड था । उसे कई सिध्दियां भी प्राप्त थी । लंकाधिपति रावण को भी उसने बंदी बना लिया था ।

एक बार राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन शिकार खेलते हुए जमदग्नि के आश्रम में पहुंच गए । ऋषि जमदग्नि उनका बहुत आदर सत्कार किया । ऋषि के पास कामधेनु गाय थी । उसी गाय के गोरस के भंडार से ही ऋषि जमदग्नि ने सबको अच्छी तरह से आवभगत किया । सहस्त्रबाहु ने जब यह सब देखा तो कामधेनु गाय उनको पसंद आ गयी ।  वे बलपूर्वक गाय को आश्रम से ले गए । परशुराम को जब यह बात पता चली तो अपने पिता के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने राजा सहस्त्रबाहु से कामधेनु वापस लेने गए । राजा सहस्त्रबाहु और गुरु परशुराम ने युद्ध किया और उसे मार डाला । इसके बाद सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप ,जब परशुराम अनुपस्थित थे .उनके पिता जमदग्नि को मार डाला ।इससे विचलित होकर उनकी माता रेणुका भी जमदग्नि के साथ सती हो गयी ।

 इस घटना से गुरु परशुराम अत्यधिक क्रोधित हुए । उन्होंने यह प्रतिज्ञा किया कि हैहयवंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूंगा । इन्होंने सबसे पहले महिष्मती नगरी में अधिकार प्राप्त किया और  उन्होंने सहस्त्रबाहु के सभी पुत्रो और उनके साथ देने वाले सभी क्षत्रिओं का नाश किया। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी पर  21 बार  क्षत्रिओं का विनाश किया। महर्षि ऋचीक ने उन्हें रोका ।  इसके बाद परशुराम जी ने अश्वमेध यज्ञ किया।  पृथ्वी को ब्राम्हणो को दान कर दिया और अपने अस्त्र और शास्त्र इंद्र को देकर, वे महेंद्रपर्वत के आश्रम में रहने लगे।

परशुराम कैलाश पर्वत पर अपने आराध्य गुरु  भगवान् शंकर  के अन्तपुर में मिलने के लिए गए। लेकिन प्रवेश द्वार पर श्री गणेश  द्वारा रोके जाने पर परशुराम से उनका वाद विवाद हो गया। गणपति ने अपनी सूड़ से भूतल में उनको पटक दिया।  जिससे अचेत हो गए।  चेतनावस्था में आने पर उन्होंने अपने परशु (फरसे) से गणेश जी पर वार किया।  जिससे उनका एक दांत टूट गया। इससे क्रोधित होकर माता पार्वती  परशुराम पर त्रिशूल चलाने के लिए उद्यत  हो गयी  थी।  लेकिन भगवान शिव के हस्तक्षेप से  माता पार्वती के गुस्से को शांत किया गया।  इसके बाद श्री गणेश जी एकदन्त के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वे आज भी मंदराचल पर्वत पर तपस्यारत है । शैव  दर्शन में उनका उल्लेख सबसे ज्यादा मिलता है । अपने साधकों और भक्तोँ को आज भी वे दर्शन देते है । ज्योतिष  शास्त्र  के अनुसार भगवान् परशुराम की साधना करने से  धन धान्य और ज्ञान का अर्जन करने वाला और हर प्रकार से सम्पन्न और साहसी होता है।


Reactions

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ