Dholavira at Gujarat history in Hindi | History of Sindhu civilization | Hindi |



 धोलावीरा पश्चिम भारत के गुजरात राज्य में कुटच जिले के भचाऊ तालुका के खादिरबेट गाँव की जगह है। यह गाँव राधनपुर से 165 दूर है। स्थानिक लोग इसे कोटडा टिम्बा भी कहते है, क्योकि इस जगह पर प्राचीन इंडस घाटी सभ्यता और हड़प्पा शहर के खंडहर पड़े हुए है।धोलावीरा हड़प्पा साम्राज्य की पाँच विशाल जगहों में से यह एक है और साथ ही हड़प्पा संस्कृति से संबंध रखने वाली भारत की प्रमुख आर्कियोलॉजिकल जगहों में से एक है। 



उस समय इस गाँव को सबसे विशाल शहर माना जाता था। यह कुटच के रण में कुटच के रेगिस्तानी वन्य जीव के पास खादिर जमीन पर बसा हुआ है।यह शहर कुल 120 एकर में फैला हुआ है। यह जगह 2650 BCE से स्थापित है, लेकिन बाद में इसका महत्त्व कम होने लगा था। इसके कुछ समय बाद यहाँ रहना और कुछ भी करना बिल्कुल वर्जित था।

 गुजरात में कच्छ जिले में स्थित है। उस जमाने में लगभग 50000 लोग यहाँ रहते थे। 4000 साल पहले इस महानगर के पतन की शुरुआत हुई। सन 1450 में वापस यहां मानव बसाहट शुरु हुई। पुरातत्त्व विभाग का यह एक अति महत्त्व का स्थान २३.५२ उत्तर अक्षांश और ७०.१३ पूर्व देशांतर पर स्थित है। यहाँ उत्तर से मनसर और दक्षिण से मनहर छोटी नदी से पानी जमा होता था। हड़प्पा के इस नगर की जानकारी 1960 में हुई और 1990 तक इसकी खुदाई चलती रही। हड़प्पा, मोहन जोदडो, गनेरीवाला, राखीगढ, धोलावीरा तथा लोथल ये छः पुराने महानगर पुरातन संस्कृति के नगर है। जिसमें धोलावीरा और लोथल भारत में स्थित है। 



इस जगह का खनन पुरातत्त्व विभाग के डॉ॰ आर. एस. बिस्त ने किया था। धोलावीरा का 100 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तार था। प्रांत अधिकारियों के लिये तथा सामान्य जन के लिये अलग-अलग विभाग थे, जिसमें प्रांत अधिकारियों का विभाग मजबूत पत्थर की सुरक्षित दीवार से बना था, जो आज भी दिखाई देता है। अन्य नगरों का निर्माण कच्ची पक्की ईंटों से हुआ है। धोलावीरा का निर्माण चौकोर एवं आयताकार पत्थरों से हुआ है, जो समीप स्थित खदानो से मिलता था। ऐसा लगता है कि धोलावीरा में सभी व्यापारी थे और यह व्यापार का मुख्य केन्द्र था। 

यह कुबेरपतियों का महानगर था। ऐसा लगता है कि सिन्धु नदी समुद्र से यहाँ मिलती थी। भूकंप के कारण सम्पूर्ण क्षेत्र ऊँचा-नीचा हो गया। आज के आधुनिक महानगरों जैसी पक्की गटर व्यवस्था पांच हजार साल पहले धोलावीरा में थी। पूरे नगर में धार्मिक स्थलों के कोई अवशेष नहीं पायें गए हैं। इस प्राचीन महानगर में पानी की जो व्यवस्था की गई थी वह अद्दभुत है। आज के समय में बारिस मुश्किल से होती है। बंजर जमीन के चारो ओर समुद्र का पानी फैला हुआ है। इस महानगर में अंतिम संस्कार की अलग-अलग व्यवस्थाएँ थी।



हड़प्पा के शहर लोथल से भी पुरानी जगह धोलावीरा है | यह शहर आयताकार आकार में बसा हुआ है और तक़रीबन 54 एकर में फैला हुआ है। कहा जाता है की यहाँ बसने वाले लोग अपने साथ पूरी संस्कृति लेकर ही आये थे। जब धोलावीरा शहर नया-नया बसा ही था तब वहाँ के लोग मिट्टी के पत्थर बनाते थे, पत्थर तोड़ते थे और शंख आदि के मनके बनाते थे।इस समय के लोगो ने अपने घरो को बनाने के लिये भी मिट्टी से बनी ईंटो का उपयोग किया था।

 देखा जाये तो धोलावीरा एक किले, मध्य शहर और निचले शहर से मिलकर बना हुआ है। आज के आधुनिक महानगरों जैसी पक्की गटर व्यवस्था पांच हजार साल पहले धोलावीरा में थी। पूरे नगर में धार्मिक स्थलों के कोई अवशेष नहीं पाये गए थे।इस प्राचीन महानगर में पानी की जो व्यवस्था की गई थी, वह अद्दभुत थी। बंजर जमीन के चारो ओर समुद्र का पानी फैला हुआ था।



पिछले 5000 वर्षों में भारत के पश्चिमी तट पर समुद्री जलस्तर एक समान नहीं रहा है। 5000 से 6000 साल पहले पश्चिमी तट पर समुद्री जलस्तर आज की तुलना में लगभग 6 मीटर ऊपर था। अर्थात 5000 साल पहले जब धोलावीरा मुख्य केन्द्र था तब समुद्र का छोर धोलावीरा के नजदीक था। सिर्फ समुद्री जलस्तर का ऊपर होना ही काफी नहीं है। समुद्री जलस्तर की तुलना में जमीन की ऊँचाई की भी स्थिति ध्यान में रखना आवश्यक है। जमीन की ऊँचाई में बदलाव समुद्री जलस्तर की स्थिति पर प्रभाव डालता है। 

धोलावीरा में जमीन की ऊँचाई वर्तमान समुद्री जलस्तर की तुलना में 12 से 28 मीटर ऊपर है। किले की जमीन की ऊँचाई मध्य नगर एवं निम्न नगर की तुलना में कम है। यही नहीं खादिर बेट के जिस इलाके में धोलावीरा है सतह में झुकाव पाया गया है। यहाँ पर यह जानना भी आवश्यक है कि गुजरात के तट पर ज्वर की ऊँचाई लगभग 2 मीटर है।किले की मोटी दीवारों को अगर समुद्री स्तर, जमीन की ऊँचाई एवं सतह के झुकाव के संदर्भ में देखें तो यह ज्ञात होता है कि 13 से 18 मीटर मोटी दीवारों का निर्माण समुद्री आपदा से बचने हेतु किया गया था। समुद्री आपदाओं की सम्भावनाएँ होने के बावजूद अन्तरराष्ट्रीय व्यापार को ध्यान में रखकर, सुरक्षा की तैयारियाँ करके प्राचीन मानव ने धोलावीरा की स्थापना की।



 इन शोध परिणामों के अलावा यह भी पाया गया कि पश्चिमी समुद्री तट के जिस हिस्से में धोलावीरा स्थित है, व क्षेत्र (मकरान तटीय क्षेत्र) विनाशकारी समुद्री तूफानों एवं सुनामी के प्रभाव में रहा है। पिछले कुछ हजार सालों का ब्यौरा निकालें तो शोधकर्ताओं ने 8000 से 7000 साल पहले एवं कुछ 2000 साल पहले के सुनामी अवशेष इस इलाके से पाये गये हैं।आपसे निवेदन है की एक बार इस प्राचीन नगर की मुलाक़ात जरुर ले| धन्यवाद |


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