बचपन खेल खेलने की बजाय घुड़सवारी, निशानेबाज़ी, तलवारबाज़ी सीखने में बीता। उन्होंने मार्शल आर्ट की भी ट्रेनिंग ली थी। माना जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद भारत में वह दूसरे योद्धा थे, जिन्हें गोरिल्ला युद्ध नीति की जानकारी थी। अपनी इस नीति का उपयोग उन्होंने बार-बार अंग्रेजों को हराने के लिए किया।
बाबू कुंवर सिंह के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वह जिला शाहाबाद की कीमती और अतिविशाल जागीरों के मालिक थे| सहृदय और लोकप्रिय कुंवर सिंह को उनके बटाईदार बहुत चाहते थे| वह अपने गांववासियों में लोकप्रिय थे ही साथ ही अंग्रेजी हुकूमत में भी उनकी अच्छी पैठ थी|
जुलाई, 1857 में पटना में क्रांतिकारियों के नेता पीर अली को अंग्रेजों ने फांसी दे दी। पीर अली की मृत्यु के बाद 25 जुलाई को दानापुर के देशी पलटनों ने स्वाधीनता का ऐलान कर दिया। ये पलटनें जगदीशपुर भोजपुर की ओर बढ़ीं। कुंवर सिंह ने तुरंत अपने महल से निकल कर शस्त्र उठा कर इस सेना का नेतृत्व किया।
कुंवर सिंह इस सेना के साथ आरा पहुंचे। आरा स्थित अंग्रेजी खजाने पर कब्जा कर लिया गया। जेल से कैदियों को रिहा कर दिया गया। अंग्रेजी दफ्तरों को गिरा दिया गया। इस विद्रोही जमात ने आरा के किले को घेर लिया। किले के अंदर थोड़े से अंग्रेज और सिख सिपाही थे। आरा के निकट एक आम का बाग था। कुंवर सिंह ने अपने कुछ आदमी आम के वृक्षों की टहनियों में छिपा रखे थे।
दो अगस्त, 1857 को आरा शहर से सटे बीबीगंज के निकट कुंवर सिंह की सेना और मेजर आयर की सेना में संग्राम हुआ। इस युद्ध में अंग्रेज जीत गये। अंग्रेजों ने जगदीशपुर पर भी कब्जा कर लिया। कुंवर सिंह अपने महल की महिलाओं के साथ वहां से निकल गये। उसके बाद आजमगढ़ के पास अतरोलिया में कुंवर सिंह ने डेरा डाला। 22 मार्च 1858 को अंग्रेजों ने मिलमैन के नेतृत्व में कुंवर सिंह पर हमला कर दिया।इस संग्राम में पहले तो कुंवर सिंह ने मैदान छोड़ दिया। पर थोड़ी ही देर के बाद हमला कर कुंवर सिंह ने अंग्रेजों को हरा कर भगा दिया। उनके माल असबाब भी कुंवर सिंह के हाथ लगे। इस शर्मनाक घटना के बाद कर्नल डेम्स के अधीन बड़ी संख्या में अंग्रेज सैनिक कुंवर सिंह से लड़ने पहुंचे। एक बार फिर मुकाबला हुआ और पराजित होकर डेम्स ने आजमगढ़ में शरण ली।
बाबू कुंवर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा, रीवां, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर एवं गोरखपुर में विप्लव के नगाड़े बजाते रहे| लेकिन कुंवर सिंह की यह विजयी गाथा ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकी और अंग्रेजों ने लखनऊ पर पुन: कब्जा करने के बाद आजमगढ़ पर भी कब्जा कर लिया|
इस बीच कुंवर सिंह बिहार की ओर लौटने लगे| जब वे जगदीशपुर जाने के लिए गंगा पार कर रहे थे तभी उनकी बांह में एक अंग्रेजों की गोली आकर लगी| उन्होंने अपनी तलवार से कलाई काटकर नदी में प्रवाहित कर दी| इस तरह से अपनी सेना के साथ जंगलों की ओर चले गए और अंग्रेज़ी सेना को पराजित करके 23 अप्रैल, 1858 को जगदीशपुर पहुंचे| वह बुरी तरह से घायल थे| 1857 की क्रान्ति के इस महान नायक का आखिरकार अदम्य वीरता का प्रदर्शन करते हुए 26 अप्रैल, 1858 को निधन हो गया|






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