आज हम जिस सुल्तान की बात कर रहे है वो न सिर्फ एक सुल्तान था पर मैसूर का शेर भी कहलाता है जिसकी एक गूंज से ब्रिटिश सत्ता की नीव हिल गयी थी.जिसे पहला मिसाइल मेन भी कहा जाता है.हम बात कर रहे है टीपू सुल्तान की.
18वीं सदी में टीपू सुल्तान मैसूर के शासक रहे थे. टीपू सुल्तान का जन्म 10 नवंबर 1750 को वर्तमान कर्नाटक में स्थित बेंगलुरू के निकट कोलार जिले के देवनहल्ली में हुआ था . उनका पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब था. उनके पिता का नाम हैदर अली और माता का नाम फ़क़रुन्निसा था. उनके पिता हैदर अली मैसूर साम्राज्य के सैनापति थे जो अपनी ताकत से 1761 में मैसूर साम्राज्य के शासक बने. टीपू को मैसूर के शेर के रूप में जाना जाता है.
अपने पिता की तरह ही वह भी अत्याधिक महत्वांकाक्षी कुशल सेनापति और चतुर कूटनीतिज्ञ थे यही कारण था कि वह हमेशा अपने पिता की पराजय का बदला अंग्रेजों से लेना चाहते थे, अंग्रेज उनसे काफी भयभीत रहते थे. टीपू सुल्तान की आकृति में अंग्रेजों को नेपोलियन की तस्वीर दिखाई पड़ती थी। वह अनेक भाषाओं का ज्ञाता थे अपने पिता के समय में ही उन्होंने प्रशासनिक सैनिक तथा युद्ध विधा लेनी प्रारंभ कर दी थी परन्तु उनका सबसे बड़ा अवगुण जो उनकी पराजय का कारण बना वह फ्रांसिसियों पर बहुत अधिक निर्भरता और भरोसा .और इसी भरोसे ने उन्हें अंग्रेजो के पैरो में डाल दिया.
टीपू सुल्तान ने अपने शासनकाल में कई तरह के प्रयोग किए थे. इसी बदलाव के कारण उन्हें एक अलग राजा की उपाधि भी प्राप्त है. जानकारी के अनुसार टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली के पास 50 से अधिक रॉकेटमैन थे और वह अपनी सेना में इन रॉकेटमैन का बखूबी इस्तेमाल करते थे. दरअसल, इन्हें रॉकेटमैन इसलिए कहा जाता था क्योंकि ये रॉकेट चलाने में माहिर थे. वो युद्ध के दौरान विरोधियों पर ऐसे निशाने लगाते थे जिससे उन्हें काफी नुकसान होता था. टीपू सुल्तान के शासन में ही पहली बार लोहे के केस वाली मिसाइल रॉकेट बनाई गई थी.
कुछ हिस्सा मराठों को भी प्राप्त हुआ जिससे उसकी राज्य की सीमा तंगभद्रा तक बढ़ गई, शेष हिस्सों पर अंग्रेजों का अधिकार रहा टीपू सुल्तान ने जायतन के रूप में अपने दो पुगों को भी कार्नवालिस को सुपुर्द किया। इस पराजय से टीपु सुल्तान को भारी क्षति उठानी पड़ी उनका राज्य कम्पनी राज्य से घिर गया तथा समुद्र से उनका सम्पर्क टुट गया.आलोचकों का कहना है कि कार्नवालिस ने इस सन्धि को करने में जल्दबाजी की और टीपू का पूर्ण विनाश नहीं कर के भारी भूल की अगर वह टीपु की शक्ति को कुचल देता तो भविष्य में चतुर्थ मैसुर युद्ध नहीं होता लेकिन वास्तव में कार्नवालिस ने ऐसा नहीं करके अपनी दूरदर्शता का परिचय दिया था उस समय अंग्रेजी सेना में बिमारी फैली हुई थी और युरोप में इंग्लैड और फ्रांस के बीच युद्ध की संभावना थी।
ऐसी स्थिति में टीपू फ्रांसिसीयों की सहायता ले सकते थे अगर सम्पूर्ण राज्य को अंग्रेज ब्रिटिश राज्य में मिला लेते तो मराठे और निजाम भी उससे जलने लगते इसलिए कार्नवालिस का उद्देश्य यह था कि टीपू की शक्ति समाप्त हो जाए और साथ ही साथ कम्पनी के मित्र भी शक्तिशाली ना बन सके इसलिए उन्होंने बिना अपने मित्रों को शक्तिशाली बनाये टीपू की शक्ति को कुचलने का प्रयास किया।जानकारी के अनुसार चौथे एंग्लो-मैसूर युद्ध में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शाही बलों को हैदराबाद और मराठों के निजाम ने अपना समर्थन दिया था. इसके बाद ही उन्होंने टीपू को हराया था और 4 मई 1799 को श्रीरंगापटना में उनकी हत्या कर दी गई थी.







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