जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने अवध राज्य को हड़पकर उनके पति नवाब वाजिद अली शाह को कोलकाता भेज दिया तब बेगम हज़रात महल ने अवध के बागडोर को अपने हाथ में ले लिया और लखनऊ पर कब्ज़ा कर लिया। उन्होंने अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादर को गद्दी पर बिठाकर अंग्रेज़ी सेना का स्वयं मुक़ाबला किया। हज़रत महल में संगठन की अभूतपूर्व क्षमता थी जिसके कारण अवध प्रांत के ज़मींदार, किसान और सैनिकों ने उनका साथ दिया और उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे।
बेगम हज़रत महल का जन्म अवध प्रांत के फैजाबाद जिले में सन 1820 में हुआ था। उनके बचपन का नाम मुहम्मदी खातून था। वे पेशे से गणिका थीं और जब उनके माता-पिता ने उन्हें बेचा तब वे शाही हरम में एक खावासिन के तौर पर आ गयीं। इसके बाद उन्हें शाही दलालों को बेच दिया गया जिसके बाद उन्हें परी की उपाधि दी गयी और वे ‘महक परी’ कहलाने लगीं। जब अवध के नबाब ने उन्हें अपने शाही हरम में शामिल किया तब वे बेगम बन गयीं
1856 में नवाब ने ब्रिटिश हुकूमत के अधीन सिद्धांतों को मानने से इंकार कर दिया | इस कारण अंग्रेजों ने अवध के राज्य पर कब्ज़ा कर लिया और नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता भेज कर बंदी बना लिया | ऐसी स्थिति में बेगम ने अवध राज्य के कार्यभार को सभांलने का फैसला किया | साथ ही अपने पति के बंदी बनाए जाने पर हज़रत महल ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ चिंगारी लगाना शुरू कर दिया |
नजीता यह रहा कि 1857 की क्रांति से पहले ही अवध राज्य में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नारजगी का दौर शुरू हो चुका था | अगली कड़ी में 1857 की स्वतंत्रता संग्राम छिड़ने पर बेगम हज़रत महल ने अपने बेटे बिरजिस कद्र को अवध की गद्दी पर बैठा दिया | ऐसा इसलिए क्योंकि वह पूरी तरह से अंग्रेजों से दो-दो हाथ करना चाहती थीं | ऐसा माना जाता है कि हिदुस्तान की पहली जंगे आज़ादी में लखनऊ का नेतृत्व हज़रत महल ने ही किया था |
सन 1857-58 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, राजा जयलाल सिंह के नेतृत्व में बेगम हज़रात महल के समर्थकों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सेना के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और लखनऊ पर कब्ज़ा कर लिया। लखनऊ पर कब्ज़े के बाद हज़रात महल अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादर को अवध की गद्दी पर बिठा दिया।इसके पश्चात जब कंपनी की सेना ने लखनऊ और अवध के ज्यादातर भाग पर फिर से कब्ज़ा जमा लिया तब बेगम हज़रत महल को पीछे हटना पड़ा।पराजय के बाद बेगम हजरत महल को नेपाल में शरण लेनी पड़ी। प्रारंभ में तो नेपाल के राना प्रधानमंत्री जंग बहादुर ने मना कर दिया पर बाद में उन्हें शरण दे दी गयी। इसके बाद उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन नेपाल में ही व्यतीत किया जहाँ सन 1879 में उनकी मृत्यु हो गयी। उन्हें काठमांडू के जामा मस्जिद के मैदान में दफनाया गया।





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