सन 1947 भारत को आज़ादी तो मिल गई थी लेकिन आज़ादी के साथ साथ बोहोत सी मुश्किलें भी साथ आई थी जैसे की देश में हो रहे दंगो को रोकना, भारत और पाकिस्तान की सरहदे तय करनी, निराश्रीतो को मदद करना इत्यादि| लेकिन इस से भी बड़ी समस्या थी अलग अलग राज्य में बटे भारत को एक करना और इस काम को सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने हाथो में लिया|
लेकिन ये काम जितना मुश्किल दिख रहा था असल में
ये उससे भी ज्यादा मुश्किल था|लेकिन इस भगीरथ कार्य को
सरदार पटेल ने अपनी बुद्धिमत्ता से सुलझा के सभी राज्यों को भारत से जोड़ दिया|आज़ादी मिलने के बाद भारत में कुल 562 अलग अलग राज्य थे जिसे
सरदार पटेल ने अपने सचिव वि.पी.मेनन की सहाय से भारत के साथ जोड़ने का निर्णय लिया|सभी राज्यों में से 559 राज्य सरदार के दिए गए प्रस्ताव को
स्विकारके भारत के राष्ट्रीय संघ के साथ जुड़ गए लेकिन इनमे से हैदराबाद, जूनागढ़ और
कश्मीर ने भारत के साथ जुड़ने से मना कर दिया| जिन्हें निचे
दिए गए तरीको से भारत के साथ जोड़ा गया|
हैदराबाद:-
यह सभी रियासतों
में सबसे बड़ी एवं सबसे समृद्धशाली रियासत थी, जो दक्कन पठार के
अधिकांश भाग को कवर करती थी। इस रियासत की अधिसंख्यक जनसंख्या हिंदू थी, जिस पर एक
मुस्लिम शासक निजाम मीर उस्मान अली, शासन करता था।
इसने एक स्वतंत्र राज्य की मांग की एवं भारत में शामिल होने से मना कर दिया। इसने
जिन्ना से मदद का आश्वासन प्राप्त किया और इस प्रकार हैदराबाद को लेकर कशमकश एवं
उलझनें समय के साथ बढ़ती गईं। पटेल एवं अन्य मध्यस्थों के निवेदनों एवं धमकियाँ
निजाम के मानस पर कोई फर्क नहीं डाल सकीं और उसने लगातार यूरोप से हथियारों के
आयात को जारी रखा। परिस्थितियाँ तब भयावह हो गईं, जब सशस्त्र
कट्टरपंथियों ने हैदराबाद की हिंदू प्रजा के खिलाफ़ हिंसक वारदातें शुरू कर दीं। 13 सितंबर, 1948 के ‘ऑपरेशन पोलों
के तहत भारतीय सैनिकों को हैदराबाद भेजा गया। 4 दिन तक चले
सशस्त्र संघर्ष के बाद अंतत: हैदराबाद भारत का अभिन्न अंग बन गया। बाद में निजाम
के आत्मसमर्पण पर उसे पुरस्कृत करते हुए हैदराबाद राज्य का गवर्नर बनाया गया।
जूनागढ़:-
गुजरात के
दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक रियासत, जो 15 अगस्त, 1947 तक भारत में
शामिल नहीं हुई थी, की अधिकांश जनसंख्या हिंदू एवं राजा मुस्लिम था। 15 सितंबर, 1947 को नवाब मुहम्मद
महाबत खानजी ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया और तर्क दिया कि जूनागढ़
समुद्र द्वारा पाकिस्तान से जुड़ा है। दो राज्यों के शासक मंगरोल एवं बाबरियावाड
जो जूनागढ़ के अधीन थे, ने प्रतिक्रिया स्वरूप जूनागढ़ से स्वतंत्रता एवं भारत में
शामिल होने की घोषणा की। इसकी अनुक्रिया में जूनागढ़ के नवाब ने सैन्यबल का प्रयोग
कर इन दोनों राज्यों पर कब्जा कर लिया, परिणामस्वरूप
पड़ोसी राज्यों के राजाओं ने भारत सरकार से मदद की अपील की। भारत सरकार मानती थी
कि यदि जूनागढ़ को पाकिस्तान में शामिल होने की अनुमति दे दी गई तो सांप्रदायिक
दंगे और भयावह रूप धारण कर लेंगे, साथ ही बहुसंख्यक हिंदू जनसंख्या, जो कि 80% है, इस फैसले को
स्वीकार नहीं करेगी। इस कारण भारत सरकार ने ‘‘जनमत संग्रह’’ से विलय के मुद्दे के
समाधान का प्रस्ताव रखा। इसी दौरान भारत सरकार ने जूनागढ़ के लिये ईंधन एवं कोयले
की आपूर्ति को रोक दिया एवं भारतीय सेनाओं ने मंगरोल एवं बाबरियावाड पर कब्ज़ा कर
लिया। पाकिस्तान, भारतीय सेनाओं की वापसी के शर्त के साथ ‘जनमत संग्रह’ के
लिये सहमत हो गया, लेकिन भारत ने इस शर्त को खारिज कर दिया। 7 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ की
अदालत ने भारत सरकार को राज्य का प्रशासन अपने हाथ में लेने के लिये आमंत्रित
किया। जूनागढ़ के दीवान सर शाह नवाज भुट्टो (सुप्रसिद्ध जुल्फीकार अली भुट्टो के
पिता), ने हस्तक्षेप के लिये भारत सरकार को आमंत्रित करने का
निर्णय लिया। फरवरी, 1948 को ‘जनमत संग्रह’ कराया गया, जो लगभग
सर्वसम्मति से भारत में विलय के पक्ष में गया।
एक ऐसी रियासत जहाँ की बहुसंख्यक जनसंख्या मुस्लिम थी, जबकि राजा हिंदू था। राजा हरि सिंह ने पाकिस्तान या भारत में शामिल होने के लिये विलय पत्र पर कोई निर्णय न लेते हुए ‘मौन स्थिति’ बनाए रखी। इसी दौरान, पाकिस्तानी सैनिकों एवं हथियारों से लैस आदिवासियों ने कश्मीर में घुसपैठ कर हमला कर दिया। महाराजा ने भारत सरकार से मदद की अपील की। राजा ने शेख अब्दुल्ला को अपने प्रतिनिधि के रूप में सहायता के लिये दिल्ली भेजा। 26 अक्तूबर, 1947 को राजा हरि सिंह ने ‘विलय पत्र’ पर हस्ताक्षर कर दिये। इसके तहत संचार, रक्षा एवं विदेशी मामलों को भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में लाया गया।
5 मार्च, 1948 को महाराजा हरि
सिंह ने अंतरिम लोकप्रिय सरकार की घोषणा की जिसके प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला बने।
1951 में राज्य
संविधान सभा निर्वाचित हुई एवं 31 अक्तूबर, 1951 में इसकी पहली
बार बैठक हुई। 1952 में, दिल्ली समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत भारतीय
संविधान में जम्मू-कश्मीर को ‘विशेष दर्जा’ प्रदान किया गया। 6 फरवरी, 1954 को, जम्मू-कश्मीर की
संविधान ने भारत संघ के साथ विलय का अनुमोदन किया। जम्मू-कश्मीर के संविधान की
धारा 3 के अनुसार, जम्मू -कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और रहेगा।
अनुच्छेद 370 के तहत, 5 अगस्त, 2019 को भारत के
राष्ट्रपति ने संवैधानिक आदेश, 2019 की उद्घोषणा की जिसमें जम्मू-कश्मीर को दिये गए
‘विशेष राज्य’ के दर्जे को खत्म कर दिया गया।
images by wikimedia commons





1 टिप्पणियाँ
😇
जवाब देंहटाएं